भारतीय किसान: एक उत्थान की खोज.


“कहते हैं की जीवन में न्यूनतम एक बार हरएक व्यक्ति को किसी शिक्षक, डॉक्टर, वकील, सिपाही की जरुरत पड़ती है, लेकिन एक किसान की जरुरत तो हमे प्रत्येक दिन तीन बार पड़ती है”

‘जय जवान, जय किसान’ : यह नारा  हमारे माननीय श्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने दिया था.. इस नारे को जय विज्ञानं जोड़कर माननीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने और जीवंत बना दिया.

लेकिन अगर भारत के सन्दर्भ में देखा जाये तो सबसे अहमियत रखती हैं – ‘जय किसान’. भारत, जहाँ आजभी ६५ फीसदी से जयादा आबादी की रोजी रोटी कृषि के उत्पादों पर निर्भर करती है, जहाँ की ७५ फीसदी से ज्यादा आबादी आज भी गांव में निवास करती है, आज अपने कृषि के अस्तित्वा को नजरंदाज कर रहा है. मैं आपके समक्ष एक प्रश्न रखना चाहूँगा – “क्या एक ऐसे खुशहाल भारत की परिकल्पना की जा सकती है जहाँ के किसान अपने कार्य को केवल एक बेबसता और लाचारी से जोड़ते हो?” हम ट्रेन से सफर करते वक्त या चलचित्र में खेतों कि हरियाली देखकर मोहित तो हो जाते हैं लेकिन क्या उन खेतों की हरियाली के पीछे छुपे दर्द को समझ पाते हैं, क्या हम उन किसानो के मेहनत का मूल्य आंकने में सटीक रहते हैं??? शायद नहीं‼!

भले ही हमे खाद्य पदार्थ कुछ चंद रुपयों में किराने कि दुकान से नसीब हो जाता है लेकिन उसकी असली मूल्य हम समझ नहीं पाते.

धान और गेहू कि पैदावार पर हुए खर्च और उससे हुए आमदनी का अगर विशलेषण करें तो हमे निचे दिए गए आकड़े प्राप्त होंगे.

निम्नलिखित आकड़े प्रति हेक्टयेर पैदावार के लिए प्रयुक्त किये गयें हैं.

  धान गेहूँ
दृढ़ लागत   13000 13000
चालू लागत 13000 12500
खेती में लागत 29000 28000
सकल पुनरवृत्ति 25000 35000
वास्तविक पुनरवृत्ति -5500 6200
कृषक लाभ 7500 19000
उत्पाद में लागत (रु प्रति क्विंटल) 627 500

भारत की स्तिथि इसलिए भी दयनीय है क्यूंकि यहाँ औसतन कृषि योग्य जमीन प्रति किसान औसतन कृषि योग्य जमीन केवल १.४६ हेक्टयेर है.  इससे देखा जाये तो औसतन एक किसान प्रति महीने केवल रु ३००० धान कि खेती पर और लगभग रु ७००० गेहूं कि खेती पर कमाता है. भारत में जहाँ न्यूनतम मजदूरी दर करीब रु २५० है, क्या कोई किसान खेतों में अपना पसीना बहाने कि चेष्टा कर सकता है और अगर वो ऐसा करता भी है तो क्या उसके साथ ये अन्याय नहीं होगा?

जिस प्रकार वायुमंडल में परिवर्तन आया है उससे यह आंकलित कर पाना की बोय गए खेतों कि पैदावार अच्छी होगी अँधेरे में तीर चलने से भी ज्यादा संदेहजनक है. आज के समय में अगर कृषि को एक दाँव की तरह देखें तो शायद गलत नहीं होगा; लेकिन उससे भी बड़ी यह है की दाँव पर लगाये गए पैसों पर जो लाभ मिलेगा वह और भी हास्यपद है.

सरकार भारत को एक अतिविकसित देश बनाने के सपने देख रही है, वह इसे महान शक्तिशाली देशों के समूह में शामिल करने के होड़ में है. मैं भारत सरकार के इस विचार से बिलकुल असहमत हूँ. मुझे एक विकसित भारत चाहिए, लेकिन उसकी विकासशीलता इस पैमाने पर नहीं आंकी जाए की वह कितना शक्तिशाली है, बल्कि इस पैमाने पर आंकी जाए की वहाँ की जनता कितनी विकसित है. ये जनता केवल बड़े-बड़े शहरो की ही ना हो बल्कि उन दूर दराज के गांव की भी हो जिन्हें आजतक हमने विकास के नाम पैर केवल धोखा दिया है. इस विकास में भारत के किसान गण भी शामिल होने चाहिए जिनकी बदौलत ही भारत की आर्थिक व्यवस्था चल रही है.

भारत कृषि व्यवस्था के समक्ष कुछ समस्या इस प्रकार हैं:

  1. भारत सरकार कृषि उद्योग के उत्थान के लिए आधारभूत सुविधाएं में कोई ठोस कदम नहीं उठा रही है जैसे कि: सिंचाई के छेत्र में, परिवहन, उत्पाद के लिए गोदाम और बाजार व्यवस्थित करना/ पिछले एक दो साल में हमने कई बार खबर पढ़ी है है की गोदाम में रखे खाद्य के हजारो बोरे बर्बाद हो गए, नए फसल के हजारो बोरे पानी में या परिवहन के अनियमितता के कारण नष्ट हो गए/ महराष्ट्र के ही विदर्भा क्षेत्र कि बात ले तो वाहन हर दिन कोई न कोई किसान अपनी अपने पेशे से तंग आकर आत्महत्या कर लेता है. क्या सरकार वहाँ के कृषि के उत्थान के लिए आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं करा सकती?
  2. जहाँ पश्चिमी देशो के किसानो को खाद्य उत्पादन के लिए वाहन कि सरकार कि तरफ से बड़े पैमाने पर आर्थिक सहायता प्रदान किया जाता है वही भारत में कृषि उत्पादन से संबन्धित आवश्यकताओ जैसे की डिजेल, बीज में अधिक पैसे लिए जा रहें हैं.
  3. भारतीय वायुमंडल में जहाँ फसल के नुक्सान होने की आशंका हमेशा रहती है, वाहन भारत सरकार द्वारा कृषि की सुरक्षा और बीमा के लिए कोई ठोस योजना नहीं है, और अगर कोई योजना है तो वह केवल बड़े किसानो तक ही पहुचती है. माध्यम और छोटे किसान को तो उसकी भनक तक नहीं लग पाती. किसानो के ऋण माफ़ी के लिए सरकार ने योजना तो बने और उसे अमल में भी लाया गया लेकिन ऋण किसके माफ किये गए आज पूरा भारत जनता है.
  4. खेतिहर मजदूर: इनकी दशा तो भारत में और भी दयनीय है. ये बड़े किसानो के खेतों में काम करके अपना जीवन यापन करते हैं/ अगर किसी करणवश उस वर्ष पैदावार नहीं हुई है तो बड़े किसान को ज्यादा नुकसान नहीं पहुचता क्यूंकि वे बीमा की मदद से आर्थिक नुकसान का वाहन कर लेते हैं मगर खेतिहर मजदूर को खाने के लाले पड जाते हैं. ये किसी दूसरे कार्य में दक्ष भी नहीं होते कि अपनी रोज़ी रोटी कमा सकें.
  5. कृषि योग्य अतिउप्जाऊ और उपजाऊ जमीन का अधिग्रहण और उस जमीन को किसी और कार्य के लिए प्रदान किया जाना भारतीय कृषि उद्योग के भविष्य पर एक बहुत ही बड़ा संकट है. इस तरीके से शायद वो किसान जिनकी जमीन अधिग्रहित की जा रही है मुआवजे से जीवन यापन का कोई और साधन तो ढूढ़ लेंगे मगर उन खेतिहर मजदूरों का क्या होगा जो उन खेतों पर काम करके अपनी जीविका चलाते हैं.
  6. अगर सरकार की कृषि उद्योग में विदेशी निवेश के नीती को दूरगामी दृष्टि से देखें तो यह भारतीय किसानो के स्वंत्रता को क्षति पहुंचा सकता है. विदेशी निवेश भले ही शुरुआत में कृषि में विकास लाए, आधुनिक तकनीक लाए, मगर एक दशक बाद ही विदेशियों की कृषि उद्योग में एकाधिकार हमारे समक्ष एक बहुत बडा संकट खडा कर देगा; शायद उस समय उसका समाधान भी आसान न हो. यह नीती केवल किसानो के स्वतंत्रा को ही क्षति नहीं पहुचायेगा बल्कि पुरे भारत की अर्थव्यवस्था को बदल डालेगा.

भारत सरकार ‘राष्ट्रिय खाद्य सुरक्षा बिल’ संसद में प्रस्तुत करने वाली है, लेकिन इस बिल में भी किसानो को और उनके निर्वहन को प्राथमिकता नहीं दी गयी है. उम्मीद करते हैं की संसद के बहस में किसानो के स्तिथि को तरजीह दी जाए और एक ठोस नीती लायी जाए जो हमारे कृषि बंधुओं के सही मायने में उत्थान करे. एक ऐसी नीती लाए जो कृषि क्षेत्र के शोध कार्य को बढ़ावा दे. एक ऐसी नीती लाए जो सिंचाई के लिए पानी वर्ष के बारहों महीने उपलब्ध कराये, एक ऐसी नीती लाए जिससे किसानो को अपनी फसल मजबूरी में कम मूल्य पर दलालो को न बेचना पड़े, एक ऐसी नीती लाए जिसमे फसल नुक्सान होने पर खेतिहर मजदूरों को भी बीमा की राशि से जीविका यापन हो सके, एक ऐसी नीती लाए जिससे किसानो को उनका पेशा एक बेबसता और लाचारी न लगे…. वो भी खुशहाल रहे.

जय किसान जय भारत.

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Posted on February 28, 2013, in Social issues. and tagged , , , , , , . Bookmark the permalink. Leave a comment.

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