Monthly Archives: July 2017

आने दो मुझे इस दुनिया में…..

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आने दो मुझे इस दुनिया में…..

(“क्यों आना चाहती हो इस दुनिया में?” का जवाब https://shivamkesari.wordpress.com/2017/07/18/क्यों-आना-चाहती-हो-इस-दुनि/ )

मुझे आने दो इस दुनिया में क्योंकि,
मुझे भी जीने का अधिकार है,
नहीं फर्क पड़ेगा औरों के सोच से मुझे,
अगर आपके आशीर्वाद में समान दर्जा होगा।
मुक्त वातावरण में मेरी परवरिश करना,
मेरी सांसो पर मेरा ही अधिकार होगा।
जीने देना मुझे अपनी जिंदगी मेरी अपनी ख्वाइशों से,
उन ख्वाइशों पर मेरा हक मुझे दे देना।
करूँगी मैंं हर आज्ञा का पालन,
बस मेरी उड़ान के पंख मत कतर देना।

आने दो मुझको इस दुनिया में,
मैं अपनी पहचान खुद बनाऊंगी,
बस मुझे आगे बढ़ने से मत रोकना।
कोशिश करूँगी समाज बदलने की,
जिसमे मेरी खुद की पहचान भी जानी जाएगी।
मेरे हौसलों के आगे सारे जंजीर भी कमजोर पड़ जाएंगे,
उन जंजीरों को तोड़कर में खुली सांसे लेकर दिखाउंगी।

आने दो मुझको इस दुनिया में,
नहीं मानती मैं खुद को बोझ किसी पर,
बोझ तो आपके समाज के सोच का है।
बस विनती करती हूँ मेरे शिक्षा और सेहत का ख्याल रखना,
दहेज जैसे बंधन से में खुद मुक्त हो जाऊंगी।
केवल इतना वादा करो,
नहीं समझोगे मुझे परायी कभी।

आने दो मुझको इस दुनिया में,
गर्भ में और जन्म के कुछ सालों तक बस सुरक्षा दे देना,
भरोसा रखो तुम मुझपर,
स्वरक्षा में प्रशिक्षित होकर,
हर हिंसा पर पलटवार करूँगी।
बनकर स्वावलंबी मैं,
उन हिंसावादी घर वालों से नाता तोड़ लुंगी।
नहीं डर लगता उन हवसियों से,
वो तो सब कायर हैं,
सोच बदलूंगी उस समाज का,
जहां दुष्कर्म के बाद कर दी जाउंगी बहिष्कृत मैं।

आने दो मुझको इस दुनिया में,
नहीं मानूँगी उस धर्म को मैं,
जो हमारी आजादी से भ्रष्ट हो जाए,
नहीं अनुशरण करूँगी उस धार्मिक ग्रंथ का मैं,
जिसमें हमें समान अधिकार न हो,
नहीं बनूँगी मैं दासी उनकी,
क्योंकि मैं स्वतंत्र हूँ।
इस मत से भटकने पर, दोषी उनको ठहराऊंगी।

पुरुष प्रधानता तो बस एक पितृसृजात्मक सोच है,
आने दो मुझको इस दुनिया में,
शिशु जनने के साथ मैं,
इस सोच को बदलकर दिखाऊंगी।

बस साथ देना तुम जहां मैं अकेले पड़ जाऊं,
रखना मेरे हौसलों को बुलंद जहाँ मैं कमजोर नजर आऊं।

आने दो मुझको इस दुनिया में,
मुझको आने दो इस बेहतरीन दुनिया में।

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क्यों आना चाहती हो इस दुनिया में…

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तुम क्यों आना चाहती हो इस दुनिया में,
ये दुनिया तुम्हारे लिए नही,
रह जाओगी एक वस्तु बनकर
दोयम दर्जे की।
सांसे लोगी पर उस सांसो पर अधिकार किसी और का होगा,
ख्वाइशें होंगी, पर उस ख्वाइश पर हक तुम्हारा न होगा,
इंसान होगी लेकिन बस केवल आज्ञा मानने तक।

क्यों आना चाहती हो तुम इस दुनिया में,
यहां तुम्हारी पहचान न होगी,
किसी मर्द के पहचान के बिना
तुम समाज में जगह न पा पाओगी,
अपनी पहचान बनाने को कई जंजीर तुम्हे बांध रखेंगे,
बीत जाएगी तुम्हारी जिंदगी उन जंजीरो में सिसक कर।

क्यों आना चाहती हो तुम इस दुनिया में,
क्या तुम्हें मालूम नही तुम हम पर एक बोझ हो,
नहीं हैं हमारे पास धन तुम्हारे दहेज के लिए,
न दे पाऊंगा मैं तुम्हें वह शिक्षा औरों के बराबर,
न रख पाऊंगा तुम्हारे सेहत का ध्यान पूर्णतया,
क्योंकि तुम परायी हो।

क्यों आना चाहती हो तुम इस दुनिया में,
तुम हमेशा हिंसा की शिकार रहोगी,
अगर गर्भ में न मारी गई तो जन्म के बाद तुमपर तलवार लटकेगी,
अगर जिंदा बच गयी तो जिंदगी भर घरेलू हिंसा का शिकार बनोगी,
ये हिंसा तो तुम्हे अपने घर वाले देंगे,
बाहर वाले तो तुम्हे हवस का शिकार बनाने को हरपल मुस्तैद रहेंगे।

क्यों आना चाहती हो तुम इस दुनिया में,
क्या तुम्हें पता नहीं हमें हमारे धर्म और धार्मिक पुस्तक का शह प्राप्त है,
अगर तुम्हें आजादी दे दी तो धर्म भ्रष्ट हो जाएगा,
ईश्वर के पुस्तक के अनुसार तुम्हे दासी बनकर ही पुरुषों की सेवा करनी होगी,
इस पथ से भटकने पर दुम दंड की भागी होगी।

क्यों आना चाहती हो तुम इस पुरुष प्रधान दुनिया मे,
तुम केवल एक बच्चा जनने वाली यंत्र बनकर रह जाओगी….

क्यों आना चाहती हो तुम इस दुनिया में,
तुम क्यों आना चाहती हो इस दुनिया में?

नफरत की आग….

 

नफरत की आग में
जल रहा है इंसानियत,
न जाने कब किसने और क्यों
यह आग लगाई।

जो रह सकते हैं साथ
खुशहाल होकर,
आज वो नफरत में बदहाल हैं।
दोष मढ़ देते हैं हम नेताओं पर
पर मारने और आग लगाने वाले तो हम हैं
और हमारे अपने दो हाथ।

क्यों हम उन चंद लोगों के बहकावे में आकर
क्रोधित हो उठते हैं,
क्यों नहीं हमे बहकाने वाले हमारे साथ चलते हैं।
क्यों नहीं वो उत्तेजित भीड़ का प्रतिनिधित्व करते हैं।

इस मार काट से कुछ नही मिलने वाला,
अगर मिलेगा तो सिर्फ वातावरण में फैला नफरत।

न जाने कब यह नफरत मिटेगा,
न जाने कब हम इंसान बनेंगे,
धर्म के आड़ में हम और कितना लड़ेंगे।

आपकी इस लड़ाई में,
न ही किसी की जीत होती
न ही होती किसी की हार,
अगर कुछ होता है तो वह है
सिर्फ विनाश, सिर्फ विनाश।

#notinourname

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